50 साल से बंजर पड़ी जमीन पर हो रही थाईलैंड के ड्रैगन फ्रूट की खेती , दिल्ली, हरियाणा पहुंच रही फल

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रायगढ़ | Sep 17, 2018

जो जमीन पिछले 50 साल से बंजर पड़ी हुई थी वहां अब विदेशी प्रजाति के ड्रैगन के पौधों में फल लगे हुए हैं। अगले एक सप्ताह में फल पक जाएंगे और उसके बाद उसे रायपुर, दिल्ली, हरियाणा जैसे शहरों में एक्सपोर्ट किया जाएगा पिछले साल तीन टन फल एक्सपोर्ट करके करीब 9 लाख रुपए मुनाफा अर्जित हुआ था। इस साल भी ऐसा ही लाभ होने का अनुमान लगाया जा रहा है।

चुन चुना गांव के अंतिम छोर में शहर के राकेश यादव ने जमीन खरीदी है। लगभग 50 साल पहले इस जमीन में उड़द, मूंग जैसी दलहनी फसलों की खेती होती थी। किसानों ने कुछ सालों से जमीन को बंजर छोड़ दिया था। इसके बाद राकेश यादव ने उस जमीन को खरीद लिया और उसमें बागवानी करने लगे। 2015 में वे थाईलैंड में आयोजित हॉट्री एक्सपो कार्यक्रम में शामिल होने पहुंचे। यहां ड्रैगन के पौधों के बारे में उन्हें जानकारी मिली। इसके बाद उन्होंने वहां से पौधे मंगवाकर अपने फार्म हाउस में लगाए। दूसरे साल में ही ड्रैगन के पौधों में अच्छे फल लगने शुरू हो गए। इसका नतीजा ये हुआ कि पिछले साल राकेश यादव को पौधों से अच्छी खासी आमदनी मिली। अब उनके फार्म हाउस में ड्रैगन के करीब 3 हजार छोटे पौधे भी तैयार हो चुके हैं। फल के साथ वे पौधों की बिक्री भी कर रहे हैं।

15 साल तक फल देते हैं पौधे – ड्रैगन के पौधे लगाने के लिए उसकी बीज की जरूरत नहीं पड़ती। इसके लिए कलमें लगाना होता है। इसकी कलमें एक बार लगाने पर यह 15 साल तक फल देती हैं। यानी एक बार पौधे लगाने के बाद 15 साल तक कमाई ही कमाई। ड्रैगन फ्रूट की खेती में पानी की भी नाममात्र जरूरत रहती है। गर्मी के सीजन में 10 दिन में एक बार और सर्दियों में एक महीने में एक बार सिंचाई की आवश्यकता रहती है। किसान इस फ्रूट के साथ धान को छोड़कर कोई भी फसल लगाकर कमाई दोगुनी कर सकते हैं।

नर्सरी में लगा ड्रैगन फ्रूट खेती

सिर्फ रात में बढ़ता है पौधा

कैक्टस की किस्म वाले पौधों से निकलने वाला फूल तीन हफ्तों में ड्रैगन फ्रूट में बदल जाता है। ये रात को ही बढ़ता है, इसलिए इसके फूल को क्वीन ऑफ द नाइट भी कहते हैं। कैक्टस का पेड़ 40 डिग्री से ज्यादा तापमान वाले इलाकों में भी तेजी से बढ़ता है। ड्रैगन फ्रूट लाल, गुलाबी और पीले रंग का होता है। इसका इस्तेमाल वाइन बनाने में भी किया जाता है। ये मैक्सिको, साउथ अमेरिका, कंबोडिया, थाईलैंड, मलेशिया, इंडोनेशिया और चीन के अलावा भी कुछ देशों में पाया जाता है।

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