पान की 15 प्रजातियों में से 11 के पत्ते रह गए छोटे, माउथवॉश व औषधि बनाने तेल भी नहीं निकाल पाए

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रायपुर Nov 17, 2018

कृषि विश्वविद्यालय में पान की खेती और शोध असफल हो गया है। हालांकि इस खेती पर विश्वविद्यालय ने 12 लाख रुपए से ज्यादा खर्च की, लेकिन 15 में से 11 प्रजातियां फेल हो गई। इतना ही नहीं, पान से रस निकालने की योजना पर भी काम शुरू नहीं हो पाया। इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय ने पान की 15 प्रजातियों के रिसर्च में महज 4 प्रजातियों की पैदावार में सक्सेस हो पाया, जबकि 2015-16 में नेशनल हॉल्टीकल्चर मिशन के तहत प्लांट फिजियोलॉजी, एग्री बायो-केमिस्ट्री मेडिसिनल एरोमेट्रिक विभाग के लिए 25 लाख की मंजूरी मिली। लेकिन पान की खेती के दावे 4 प्रजातियों तक ही सीमित होकर रह गए। जबकि शोध वैज्ञानिकों ने प्रोजेक्ट शुरू करने के दौरान दावा किया था कि पुरानी पद्धति के बदले डोम में खेती करने से पान के उत्पादन में बढ़ोतरी होगी। साथ ही कई राज्यों के चर्चित पान की एक छत के नीचे खेती की जा सकेगी।

इन 15 प्रजातियों की हो रही थी खेती

अलग-अलग राज्यों में प्रचलित पान की प्रजातियों में से रामटेक बंगला, रामटेक कपूरी, रामटेक मीठा पान (महाराष्ट्र) से लाए गए। इनके अलावा बंगला लोकल के साथ ही मीठा, कपूरी (इंदौर) के पान को भी शोध के लिए तय प्रजातियों में शामिल की गई। जबकि मैतीगुडी, उत्कल सुदामा, घनाघाटी, मीठा कम बंगला (ओडिसा) की प्रजातियों को उत्पादन के लिहाज से शोध के लिए लगाए गए। साथ ही कारापाकी, बिलौरी (खैरागढ़) के अलावा असम की कपूरी पत्ती पान की भी खेती की जा रही है।

इन कारणों से पान के पौधे नहीं हुए विकसित

4 प्रजातियां ही सफल हो पाईं

 चार साल पहले पान की खेती को शोध के लिए उगाया था। इनमें शामिल की गई 15 में से 4 प्रजातियों के पान सफल हुए हैं। जबकि 11 प्रजातियों के पत्ते जिस अनुपात में विकसित होने थे, वे अपेक्षा से छोटे रह गए। डॉ. बीसी जैन, प्रभारी पीआरओ, इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर

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