Exclusive: कृषि विकास में मददगार होगा काले धन पर प्रहार-राधा मोहन

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कैशलेस अर्थव्यवस्था से देश को लाभ होगा, व्यक्तिगत स्तर पर भी तमाम लाभ होंगे। केंद्रीय कृषि मंत्री राधामोहन सिंह मानते हैं कि नोटबंदी के बाद ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल लेन-देन काफी बढ़ा है। नोटबंदी के बाद खाद-बीज से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों की अन्य तमाम दिक्कतों पर राधामोहन सिंह से बात की हिन्दुस्तान के राजनीतिक संपादक निर्मल पाठक ने:

सवाल: नोटबंदी का खेती-किसानी पर असर पड़ा है। बीज न खरीद पाने से बुवाई में देर हुई, फसल का मूल्य नहीं मिल पा रहा। आपका क्या फीडबैक है?
जवाब: पहली बात तो यह कि नोटबंदी का फैसला देशहित में लिया गया है। इस पर मिले जन-समर्थन से विपक्ष घबराया हुआ है। इसलिए किसान का मुखौटा लगाकर उन लोगों ने कुछ दलील देने की कोशिश की है। लेकिन पश्चिम बंगाल व उत्तर प्रदेश के आंकड़ों ने उन लोगों की दलील खारिज कर दी है। मेरे पास राज्य सरकार की ओर से भेजे गए आंकड़े हैं। उदाहरण के लिए, यूपी में पिछले वर्ष दो दिसंबर तक 60 लाख हेक्टेयर में बुवाई हुई थी, जबकि इस वर्ष दो दिसंबर तक 70 लाख हेक्टेयर में बुवाई हुई है।

सवाल: लेकिन कई जगहों से खबरें आईं कि किसान अपना धान नहीं बेच पा रहे। नोटबंदी के चलते उन्हें सही दाम नहीं मिल रहा?

जवाब: हां, निश्चित रूप से। दरअसल, धान खरीद की व्यवस्था राज्यों की ओर से की जाती है। लेकिन कुछ ऐसे राज्य हैं, जैसे पश्चिम बंगाल, बिहार और उत्तर प्रदेश, इनके पास खरीद की व्यवस्था ठीक नहीं है। इन राज्यों में किसानों को समर्थन मूल्य नहीं मिल पाता है। मगर बाकी राज्यों, जिनमें हरियाणा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, महाराष्ट्र, पंजाब, और अब झारखंड में खरीद होती है। इस तरह की ज्यादातर शिकायतें यूपी, बिहार और बंगाल से ही हैं। इन राज्यों के पास या तो खरीद की मशीनरी नहीं है या फिर इनकी दिलचस्पी नहीं है। नोटबंदी का असर होता, तो बाकी राज्यों पर भी होता। सिर्फ यहीं क्यों हैं? मैंने छह दिसंबर को कुछ राज्यों से रिपोर्ट मांगी थी, जिनमें महाराष्ट्र, आंध्र, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल, यूपी व गुजरात शामिल हैं। वहां मंडियों में जो खरीद हुई, उसमें 80 फीसदी भुगतान ऑनलाइन हुआ है।

सवाल: डिजिटल लेन-देन भारत जैसे देश में कितना व्यावहारिक है?
जवाब: मैं आपको मंडियों में खरीद की जानकारी दे रहा था। इन मंडियों में 108.32 करोड़ रुपये का व्यापार हुआ। इसमें 98 करोड़ कैशलेस है। सरकार कैसलेस की दिशा में कैसे बढ़ रही है, मैं अपने मंत्रलय का उदाहरण दे सकता हूं। मैंने 25 नवंबर को अधिकारियों के साथ बैठक की थी। इसमें मंत्रलय से जुड़ी सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों, नाबार्ड व नीति आयोग के अधिकारियों को भी बुलाया था। इसके बाद दो और बैठकें नीति आयोग और राज्यों के सहाकारिता अधिकारियों के साथ हुईं। परिणाम यह है कि सहकारी बैंकों में नोटबंदी के बाद डेढ़ करोड़ खाते खुले। इफ्को के 250 किसान सेवा केंद्र हैं। वहां छह दिसंबर तक 65 केंद्रों पर पीओएस मशीनें लग गई थीं। कुछ केंद्र मैंने खुद जाकर देखे। दिल्ली में मदर डेयरी के 1,100 बूथ हैं। नोटबंदी के पहले 500 पर पीओएस की सुविधा थी। नोटबंदी के एक सप्ताह के भीतर सभी जगह यह सुविधा मिलने लगी है। मदर डेयरी में नोटबंदी के बाद से कार्ड से भुगतान करने वालों की संख्या चार गुना बढ़ी है।

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