ज्यादा एमएसपी से किसानों को कम लाभ

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राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में किसानों के व्यापक विरोध प्रदर्शनों के एक दिन बाद और मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ तथा मिजोरम में होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले केंद्र सरकार ने 2018-19 रबी फसल सत्र के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की घोषणा करके किसान मतदाताओं की नाराजगी दूर करने की कवायद की है। यह समर्थन मूल्य एक अप्रैल, 2019 के विपणन सत्र से लागू होगा। खरीफ की तरह रबी के लिए ए2+एफएल लागत से 50 फीसदी अधिक के पूर्व निर्धारित फॉर्मूले पर एमएसपी तय किया गया। ए2+एफएल लागत में फसल उत्पादन में लगने वाला सभी तरह का खर्च और पारिवारिक श्रम की लागत शामिल है। लेकिन सवाल उठता है कि क्या एमएसपी बढ़ाना और सरकारी खरीद अभियानों का विस्तार करना बढ़ते ग्रामीण संकट का समाधान है?
इस आधार पर गेहूं का एमएसपी 1,840 रुपये प्रति क्विंटल तय किया गया जो उत्पादन लागत से 112.5 फीसदी अधिक है। इसी तरह चने का एमएसपी 4,620 रुपये प्रति क्विंटल उत्पादन लागत से 75.2 फीसदी अधिक, मसूर के मामले में 77 फीसदी अधिक और सरसों के मामले में करीब 90 फीसदी अधिक है। ऊपर से देखने पर यह कहा जा सकता है कि सरकार ने लगातार दूसरी बार उत्पादन लागत से 50 फीसदी अधिक एमएसपी देने के अपने वादे को पूरा किया है। लेकिन हकीकत में एमएसपी में बढ़ोतरी गुमराह करने वाली हो सकती है।
आंकड़ों के मुताबिक 2017-18 से 2018-19 के बीच उत्पादन लागत में छह फीसदी की बढ़ोतरी हुई और यह 817 रुपये प्रति क्विंटल से 866 रुपये प्रति क्विंटल पहुंच गई। इन दो वर्षों के दौरान एमएसपी में 6.1 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। इसी तरह चने के लिए ए2+एफएल लागत पिछले दो वर्षों के दौरान 2,461 रुपये प्रति क्विंटल से बढ़कर 2,637 रुपये प्रति क्विंटल पहुंच गई जो 7.15 फीसदी अधिक है। इस दौरान एमएसपी में पांच फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। इसमें कुसुम अपवाद है जिसकी उत्पादन लागत 5.4 फीसदी बढ़ी है जबकि उसकी एमएसपी में 20.6 फीसदी की बढ़ोतरी की गई है। लेकिन रबी फसलों में कुसुम का हिस्सा बहुत कम है और इसकी खरीद बहुत सीमित है। इसलिए इसके एमएसपी में भारी बढ़ोतरी का सीमित असर होगा।
कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी) के आंकड़ों के मुताबिक सरकार के सर्वश्रेष्ठ प्रयासों के बावजूद एमएसपी का ज्यादातर किसानों को सीमित फायदा हुआ है। उदाहरण के लिए 2019-20 विपणन सत्र के लिए आयोग की रबी रिपोर्ट के अनुसार 2016-17 के विपणन सत्र के बाद उच्च एमएसपी से सीधे लाभांवित होने वाले किसानों की संख्या 94 फीसदी बढ़ी है। यह 21.4 लाख से करीब 40 लाख पहुंच चुकी है। अगर किसानों की कुल संख्या के अनुपात में देखा जाए तो अलग तस्वीर दिखती है।
उदाहरण के लिए देश में गेहूं उपजाने वाले किसानों की 44 फीसदी आबादी उत्तर प्रदेश में है लेकिन उनमें से केवल सात फीसदी को ही सरकार की गेहूं खरीद नीति का फायदा हुआ है। राजस्थान में यह आंकड़ा चार फीसदी से भी कम है। आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक पंजाब में 80 फीसदी से अधिक किसानों को उच्च एमएसपी का फायदा हुआ है जबकि देश में गेहूं उपजाने वाले किसानों की केवल तीन फीसदी आबादी पंजाब में है।  चने के मामले में मध्य प्रदेश में 768,000 किसानों को 2017-18 के रबी सत्र में सरकारी खरीद का फायदा मिला जो राज्य में दलहन किसानों की 39 फीसदी आबादी है। इसी तरह उसी सत्र में नेफेड की सरसों की खरीद से हरियाणा और राजस्थान में केवल 250,000 किसानों को फायदा हुआ। साफ है कि खरीद अभियानों में विस्तार नहीं होने से उच्च एमएसपी से अधिकांश किसानों की आय में कोई बड़ा सुधार नहीं आता है।
क्रिसिल की हाल में आई एक रिपोर्ट के मुताबिक इस साल भी किसानों की आय कम रहेगी। अब तक उच्च एमएसपी से मुनाफा बढ़ाने में ज्यादा मदद नहीं मिली है। सच्चाई यह है कि थोक मंडी कीमतें जुलाई में घोषित एमएसपी से कम चल रही हैं। हालिया आंकड़ों के मुताबिक 2010-11 से 2015-16 के बीच भारतीय कृषि की औसत जोत में करीब 6 फीसदी की कमी आई है और यह 1.08 हेक्टेयर रह गई है। इससे छोटे और सीमांत किसानों की संख्या बढ़कर करीब 86 फीसदी हो गई है और उन्हें आय के लिए गैर कृषि कामों का रुख करना पड़ा है।
ऐसे वक्त में जब गैर कृषि आय स्रोतों पर निर्भर ग्रामीण परिवारों की संख्या करीब 52 फीसदी पहुंच गई है, तो फिर सवाल उठता है कि एमएसपी से उनकी स्थिति में कितना और किस हद तक सुधार आ सकता है। स्मॉल फार्मर्स एग्रीबिजनेस कंसोर्टियम के पूर्व अध्यक्ष परवेश शर्मा ने बिज़नेस स्टैंडर्ड से कहा, ‘निश्चित रूप से एमएसपी ग्रामीण संकट का समाधान नहीं है लेकिन यह एक अहम हथियार है, बशर्ते इसके लिए प्रभावी और विस्तारित खरीद का सहारा लिया जाए। मुझे लगता है कि आने वाले वर्षों में भावांतर भुगतान योजना और खरीद में निजी कंपनियों की भागीदारी की अहम भूमिका हो सकती है।’
जय किसान आंदोलन के संयोजक अवीक साहा का कहना है कि जब तक सभी किसानों को सभी फसलों के लिए कानून के जरिये एमएसपी की व्यवस्था नहीं की जाती है तब तक आप इसे लागत के ऊपर 100 फीसदी बढ़ाएं या 200 फीसदी, इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा।

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