समर्थन मूल्य एक भ्रम, सरकार जो घोषित करती है वह मिलता नहीं

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भोपाल | Oct 06, 2018

भारत में अब भी भूख एक समस्या है। तमाम प्रयासों के बावजूद हम इस समस्या से पूरी तरह निजात नहीं पा सके हैं। फसलों के समर्थन मूल्य में वृद्धि भी एक भ्रम है। सरकार जो समर्थन मूल्य घोषित करती है वह मिलता नहीं है। हमारे देश की परिस्थितियां ऐसी हैं कि हमें एक तरफ किसानों को सब्सिडी और समर्थन मूल्य देना होगा और दूसरी तरफ गरीबों को सस्ता अनाज भी उपलब्ध कराना होगा।

इसके लिए वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गनाइजेशन (डब्ल्यूटीओ) में कृषि से संबंधित प्रस्ताव पर भारत को अपने रूख पर कायम रहना चाहिए। यदि इस प्रस्ताव को मान लिया गया तो भारत सरकार खेती को सहयोग नहीं कर पाएगी। यह बात कृषि अर्थशास्त्री वायके अलघ ने ‘वैश्वीकरण और भारतीय किसान’ विषय पर अपने लेक्चर में कही। वे एमएन बुच स्मृति व्याख्यान के चौथे आयोजन को संबोधित कर रहे थे। नेशनल सेंटर फॉर ह्यूमन सेटलमेंट एंड रिसर्च और फ्रेंड्स ऑफ एनवायरनमेंट द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर और कई पूर्व व वर्तमान आईएएस अधिकारी मौजूद थे।

पूर्व केंद्रीय मंत्री अलघ ने कहा कि वर्ष 1900 से 1905 के प्रति व्यक्ति अनाज की खपत 200 किलो थी, जो 1940-45 में घट कर 148 किलो रह गई थी। आज भी हम इसे 180 किलो तक ही ला पाए हैं। भारत में लोगों के लिए दो कागज महत्वपूर्ण हैं। एक मतदाता परिचय पत्र और दूसरा राशन कार्ड। एक उन्हें वोट देने का अधिकार देता है और दूसरा उन्हें अनाज मुहैया कराता है।

कार्यक्रम के दौरान वायके अलघ।

150 प्रतिशत समर्थन मूल्य देने की बात गलत

अलघ ने कहा कि सरकार ने समर्थन मूल्य काफी हद तक बढ़ाए हैं, लेकिन 150 प्रतिशत तक समर्थन मूल्य देने का दावा गलत है। सरकार के समर्थन मूल्य की गणना में ट्रांसपोर्टेशन और बटाई (किराए) का खर्चा आदि शामिल नहीं है, इसे भी शामिल किया जाना चाहिए। अलघ ने कहा कि आईएएस अधिकारी ही सारी दुनिया चलाएंगे यह सोच गलत है। सिस्टम कुछ ऐसा हो गया है कि एक बार जो तय हो जाता है वह बदलता नहीं। गांधी जी ने मिल मजदूरों की लड़ाई में डीए का जो फार्मूला बनवाया वह हाल के वर्षों तक चलता रहा। डब्ल्यूटीओ में भी हम 1987 के बैस रेट को बदलने की स्थिति में नहीं हैं।

आज भी बाजार ही कीमत तय कर रहा : शर्मा

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे पूर्व आईएएस अधिकारी प्रवेश शर्मा ने कहा कि आज भी बाजार ही फसल की कीमत तय कर रहा है। सोयाबीन की कीमत शिकागो के बाजार के आधार पर तय होती है। किसान को सब्सिडी और सस्ता कर्ज नहीं चाहिए बल्कि उसकी मांग है कि समय पर कर्ज मिले, फर्टिलाइजर, पेस्टिसाइड्स और बीज बेहतर क्वालिटी के मिल जाएं और फसल का बेहतर मूल्य मिल जाए।

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