किसानों को नकद भुगतान नहीं करने से तरलता का संकट

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इन्दौर Nov 08, 2018

नोटबंदी के बाजारों में तरलता का संकट गहराया हुआ है। किसानों को उनकी कृषि उपज का मूल्य मंडी एक्ट के अनुसार नकद भुगतान किया जा सकता है। नोटबंदी को दो वर्ष पूरे हो गए हैं। किसानों को नकद भुगतान यदि शुरू कर दिया जाए तो बाजारों में कुछ मात्रा में रौनक लौट सकती है। सरकार की कार्यप्रणाली से विश्वास का संकट छाया हुआ है। इस वजह से नए निवेश लगभग ठप है। कारोबारियों में निराशा होने के बाद जीएसटी में राजस्व कैसे बढ़ रहा है, यह शोध का विषय है। इस वर्ष मानसून ने कहीं तबाही मचाई है तो कहीं सूखा छोड़ दिया है। इस बार सूखे का क्षेत्र अधिक होने से न केवल खाद्यान्न उत्पादन प्रभावित होगा, वरन् पीने का पानी एवं बिजली का संकट भी झेलना पड़ेगा। बेरोजगारी के दौर में मजदूर काम करना ही नहीं चाहते हैं। गुजरात में हुए पलायन से कपड़ा उद्योग को बड़ा धक्का लगेगा।

सूखे से जूझने को मजबूर

नोटबंदी के बाद से देश में तरल पूंजी का अभाव होने से उद्योग-धंधे ठप पड़ हैं। गाड़ी जैसे-तैसे चल रही है। गाड़ी धीमी चलने की आदत बन गई है, किंतु इस वर्ष मानसून की वर्षा कम होने से देश के कुछ भाग सूखे से जूझने को मजबूर हो गए हैं। आने वाले महीनों में सूखे की वजह से खाद्यान्न-उत्पादन घटेगा, बिजली कम बनेगी, रोजगार का संकट पैदा होना तय है, इससे अराजकता की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। सूखे की वजह से पर्यावरण बिगड़ेगा, भूखमरी फैलेगी, उद्योगों के पहिए पहले ही धीमी गति से चल रहे थे, अब और धीमे पड़ जाएंगे। मार्च तक तापमान में ऐसा ही बना रहा तो खाद्यान्न उत्पादन बुरी तरह से प्रभावित होगा। इसमें थोड़ी-बहुत राहत यदि आने वाले एकाध माह में तभी मिल सकती है, एक-दो शीतकालीन वर्षा हो जाए। इससे मौसम में परिवर्तन आएगा, फसलों में जान आ जाएगी। श्रमिक काम क्यों नहीं करना चाह रहे हैं, पलायन क्यों कर रहे हैं, यह विचारणीय विषय है।

कारोबार का फैलाव बंद

ऐसा आभास हो रहा है कि नोटबंदी के प्रभाव से शायद मुक्त होना संभव ही नहीं है। कारोबार में इतनी सिकुड़न आ गई है कि बड़ा लाभ एवं लगातार लाभ कमाने वाले दिन अब जाते रहे। जैसे-तैसे दैनंदिन की रोजी रोटी चलते रहे और दिन चर्चा जारी रहे, यही प्रयास किए जाने लगे हैं। पूर्व के वर्षों में कारोबार के फैलाव के लिए आए दिन विशेषज्ञों की राय ली जाती थी। नए उद्योग-धंधे डाले जाते थे। विदेशी निवेश आता रहता था। वर्तमान में विदेशी निवेश तो दूर भारतीय निवेश के लाले पड़ने लगे हैं। उद्योग-धंधों की अंदरूनी स्थिति ठीक नहीं है। चाहे सरकार जीएसटी से प्राप्त राजस्व को प्रति माह में रिकॉर्ड बना रही हो। जब बाजारों में कारोबार ठंडा चल रहा है, देश के अनेक उद्योग जिसमें कपड़ा भी सम्मिलित है, उत्पादन आधा होने के बाद भाव घटाकर बेचना पड़ता है।

पासे उलटे पड़े

इसे केंद्र एवं राज्य सरकारों को दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि कृषि जिंसों के भाव दिलाने के लिए जितनी भी कवायद की गई, पासे उलटे ही पड़ते गए। पहला नुकसान किसानों को हुआ,दूसरा बाजारों में दलहन-दालों के भावों की घटबढ़ नहीं होने से कारोबारियों को। कारोबारियों की जो स्थिति बनी है, उसका वर्णन करना ही कठिन है। आम छोटे व्यापारी यह कहते हुए जरा भी संकोच नहीं करते हैं कि वर्तमान में सत्तासुख भोग रही सरकार ने हमारे पेट पर लात मारी है।

मजदूर काम नहीं चाहते

एक तरफ चारों तरफ बेरोजगारी का हल्ला मचाया जा रहा है, किंतु उद्योगों को मजदूर नहीं मिल रहे हैं। मनरेगा अथवा 1 रुपए किलो में गेहूं देने के बाद मजदूर मिलना कठिन हो गया है। नोटबंदी के पूर्व चौराहों पर 400 से 500 रुपए में मजदूर नहीं मिलते थे, अब मजदूरी कुछ कम हुई है, किंतु मजदूर काम ही नहीं करना चाहते हैं। नोटबंदी के बाद देश के अनेक शहरों में मजदूरों की आवश्यकता है, एवं मकान, दुकान किराए से देने बोर्ड लटके हुए दिखाई देते हैं। यह एक अभूतपूर्व परिस्थिति है। इसमें स्पष्ट होता है कि कारोबार बैठ गया है। हाल ही में गुजरात में श्रमिकों के पलायन की घटना से वहां के कपड़ा उद्योगपतियों की आने वाले महीनों में क्या स्थिति बनेगी, वह सरकार के सामने आ जाएगी।

ट्रांसपोर्ट उद्योग परेशानी में

पिछले एक-डेढ़ वर्ष से खाद्यान्न का कारोबार में सरकारी एजेंसियों के हस्तक्षेप से ट्रांसपोर्ट उद्योग का कारोबार ठप पड़ा था। डीजल पिछले वर्ष में 58 रुपए लीटर था, बढ़कर 74 रुपए लीटर के आसपास हो गया है। ट्रांसपोर्ट व्यवसाय बैठ गया है। वर्तमान में पड़े सूखे की वजह से अगले 6 माह तक यह व्यवसाय ठंडा ही रहेगा। टोलटैक्स ने भी इस उद्योग की कमर तोड़कर रख दी है। अनेक बैंकों एवं निजी वित्तीय कंपनियों ने ऋण देना बंद कर दिया है। सरकार एवं रिजर्व बैंक के बीच चल रही तनातनी में एक मुद्दा यह भी है। बाजारों में तरल पूंजी का अभाव है। बदली हुई परिस्थितियों में नया निवेश नहीं हो रहा है। आयात अधिक एवं निर्यात कम होने से भी बैलेंस बिगड़ गया है। रुपया कमजोर पड़ने के बाद निर्यात में वृद्धि नहीं हो सकी है। सरकार चाहती है कि सोने में धन नहीं लगे, किंतु देश का वातावरण अनिश्चितता के दौर से गुजरने की वजह से चोरी-छिपे सोने में निवेश बढ़ रहा है।

सरकारों एवं उनकी कार्यप्रणाली पर विश्वास का संकट, पेट्रोल-डीजल की अभूतपूर्व कीमतें।

सूखे की वजह से खाद्यान्न उत्पादन में गिरावट

बिजली का संकट, बेरोजगारी, भूखमरी बढ़ने का भय।

उद्योग-धंधों की गति पहले ही धीमी थी, अब और मंद पड़ सकती है।

बाजारों में तरल पूंजी का अभाव।

बैंकों से ऋण मिलना आसान नहीं।

वस्तु बाजारों में अब तेजी का दौर।

विश्वास का संकट।

नए निवेश लगभग बंद।

सीबीआई, न्यायालय एवं रिजर्व बैंक भी विवाद में।

संजीवनी बूटी की जरूरत

नोटबंदी एवं जीएसटी के बाद देश के कारोबारियों को सरकारी संजीवनी बूटी की जरूरत थी। क्योंकि बाजारों में ठहराव आ गया था, उसको गति देना जरूरी भी इसके अलावा खर्च करने की प्रवृत्ति में बदलाव आ गया है। उसमें बदलाव लाना था। वित्त मंत्रालय ने कुछ नहीं किया।

किराए से देना है

शहरी क्षेत्रों के बड़े-बड़े शोरूम्स गोदाम, फ्लेट एवं आवासीय मकानों पर किराए सेदेना है, के बोर्ड टंगे नजर आते हैं। शोरूम्स, गोदामों के भाड़े भी कम हो गए हैं। नोटबंदी के पूर्व शोरूम्स एवं गोदामों के किराए मनमाने तरीके से मांगे जाते थे।

राजस्व में वृद्धि

केंद्रीय वित्त मंत्रालय प्रति तीन माह में राजस्व वृद्धि के आंकड़ों को देखकर फूला नहीं समा रहा है। अक्टूबर में राजस्व संग्रह 1 लाख करोड़ का हो गया। राजस्व बढ़ रहा है, तो कारोबार में नीरसता क्यों आ गई। राजस्व क्यों एवं कहां से बढ़ रहा है, यह जांच का विषय है।

असंतोष ही असंतोष

रिजर्व बैंक के गवर्नर ने 19 नवंबर को निदेशक मंडल की बैठक बुलाई है। सरकार द्वारा उठाए गए मुद्दों पर चर्चा होगी। सीबीआई में जो हुआ है, इससे इसे संस्था की सीख भी दाव पर लग गई है। आयकर विभाग के कार्यप्रणाली से उद्योगपति एवं कारोबारी खुश नहीं है।

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