काली मस्सी रोग व पानी की कमी के कारण किसान संतरे की फसल उखाड़ने को मजबूर

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नीमच Nov 08, 2018

मंदसौर जिले में सबसे ज्यादा संतरा उत्पादन गरोठ, शामगढ़, भानपुरा क्षेत्र में होता है। अधिकतर किसानों ने जमीन पर अन्य फसलों के साथ संतरा के छोटे-बड़े बगीचे लगा रखे हैं। जहां 100 से लेकर 1 हजार तक पौधे लगे हैं। इस बार मौसम के कारण काली मस्सी सहित अन्य रोग से संतरा पौधे खराब हाेने लगे। दूसरी तरफ पानी की भी कमी भी संतरा उत्पाद किसानों के लिए परेशानी का कारण बन गई। ऐसे में एक महीने में 100 से ज्यादा किसानों ने बगीचों में खड़े संतरा के हजारों पौधे काट दिए या फिर जड़ से उखाड़कर दिए।

अंचल में बारिश के बाद से किसान संतरा फसल के लिए तैयारी शुरू कर देते हैं। नए पौधे रोपने के साथ पुराने पौधों की कटाई, छंटाई सहित क्यारियां बनाने और रोग से बचाने के लिए भी उपाय करते हैं। बावजूद अंचल में एक महीने से संतरा उत्पादक किसान परेशान हैं। हालात यह हैं कि पौधों का चार-पांच साल ध्यान रखने के बावजूद इस बार खेत पर बने संतरा के बगीचों में लगे संतरा के पौधाें को काली मस्सी रोग ने जकड़ रखा है। इसके कीड़ों से निजात पाने के लिए किसान दवाइयों का छिड़काव भी कर रहे हैं। इससे कुछ हद तक तो राहत मिली फिर भी 100 से ज्यादा किसान बगीचों से हजारों पौधे काटने के साथ उखाड़ चुके है। संतरा उत्पादक किसान किशनसिंह चौहान का कहना है कि पिछले कुछ समय से संतरा में काली मस्सी सहित अन्य रोग के कारण फल उगने के पहले ही पत्तों पर रोग लग गया। रोग के कारण पौधे धीरे-धीरे खत्म होते जा रहे हैं लगातार 4-5 सालों तक जिन पौधों की रात-दिन बच्चों देखभाल करने के साथ कोई रोग न लगे और उत्पादन बेहतर हो, इसके लिए कीटनाशक व दवाइयां भी डाली गई। अब जब फसल लेने का समय आया तो उससे कुछ माह पूर्व ही काली मस्सी रोग का कहर शुरू हो गया। इसके कारण खेत में लगाए 500 पौधों में से 200 से ज्यादा पौधे काटना पड़े। साठखेड़ा क्षेत्र के मदनसिंह ने बताया कि एक तरफ काली मस्सी तो दूसरी तरफ पानी की कमी भी संतरा फसल पर असर डाल रही है। ग्राम किलगारी के किसान गुमानसिंह ने बताया कि उन्होंने हाल ही में अपने खेत में खड़े 400 पौधों पर बढ़ते काली मस्सी रोग के प्रकोप के कारण काटना पड़े। ग्राम बिशनिया के रामसिंह ने बताया कि खेत में खड़े 500 पौधे काट कर फेंक दिए हैं। खेतों में अब लहलहाते बगीचे की जगह ठूंठ रह गए हैं। किसान आत्माराम, मोहनलाल महाराज, किशोरसिंह राजपूत ने बताया कि हमारे परिचित करीब संतरा उत्पाद किसानों में से करीब 50 किसानों ने तो पिछले महीने ही पौधे काट दिए और पौधों के ठूंठ के आस-पास अन्य फसल के लिए जुताई कर बीज बो दिए हैं ताकि कुछ तो नुकसान की भरपाई हो। किसानों का कहना था कि उन्हाेंने 4 से 6 साल पहले 30 से लेकर 45 रुपए प्रति पौधे की दर से खरीदे और पौधों को बोने के लिए कहीं स्वयं ने गड्ढे खोदे को कई किसानों ने प्रति गड्ढे खुदाई के लिए मजदूरी के लिए 40 से 60 रुपए तक भुगतान किए। उसके बाद इतने सालों से तक देखरेख करने के साथ पानी की कमी के बावजूद पानी खरीदकर पौधों को सींचा। साथ ही रोग न लगे इसके लिए कीटनाशक व दवाइयाें का छिड़काव भी किया। अब-जब अच्छी फल लगने का समय आया तो पौधों को रोग जकड़ने लगे, उस पर पानी की कमी बरकरार है।

संतरा के बगीचे में अब पौधों की जगह दिख रहे पौधों के ठूंठ।

एक हजार हेक्टेयर क्षेत्र में खड़े हैं हजारों बगीचे

गरोठ अंचल की ही बात करें तो क्षेत्र के अधिकतर किसानों ने अपने खेत पर छाेटे-बड़े बगीचे संतरा उत्पादन के लिए लगा रखे हैं। उद्यानिकी विभाग के मुताबिक गरोठ उपखंड क्षेत्र के करीब एक हजार हेक्टेयर क्षेत्र में संतरा फसल खड़ी है। इस बार काली मस्सी रोग ने किसानों को परेशान कर दिया हैञ।

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