सूखे की वजह से चालू सीजन में शकर का उत्पादन 315 लाख टन होना संभव

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श्योपुर Nov 10, 2018

गन्ना उत्पादक किसानों को बदली हुई परिस्थिति में उत्पादन में कमी करना चाहिए एवं भाव वृद्धि की मांग नहीं करना चाहिए। उद्योग घाटे में है। ये बंद हो गए तो गन्ने की खेती भी बंद होना स्वाभाविक है। यह सही है कि बिजली – डीजल एवं अन्य खर्च बढ़े हैं, किंतु उन्हें स्वयं वहन करना पड़ेगा। शकर उद्योग पर अरबों रुपए कर्ज है। यह कर्ज कैसे चुकेगा, अभी तो यह कल्पना करना कठिन है। सूखे की वजह से चालू सीजन में 315 लाख टन शकर उत्पादन का अनुमान लगाया जाने लगा है, जबकि पिछले वर्ष करीब 322 लाख टन हुआ था। शकर मिलें गन्ने के रस से एथनॉल भी बनाने वाली हंै। अभी तक केवल 8.32 लाख टन के निर्यात सौदे हुए हैं। नवंबर-दिसंबर में अधिक से अधिक शकर निर्यात करने के प्रयास करना जरूरी है।

उत्पादन मांग से अधिक

केंद्र सरकार को वोट बैंक की राजनीति से अलग हटकर उद्योग एवं देश की अर्थ व्यवस्था की ओर ध्यान देना चाहिए, अन्यथा पहले शकर उद्योग बर्बाद होगा और बाद में लाखों गन्ना उत्पादक किसान। किसी कृषि जिंस के मनमाने भाव नहीं मिल रहे हैं, तो उस कृषि जिंस का उत्पादन बंद कर देना चाहिए, किंतु ऐसा कुछ भी नहीं हो रहा है। देश में गन्ने का उत्पादन मांग से अधिक है। शकर उद्योग घाटे में है। इसके अलावा किसानों में असंतोष नहीं फैले इसके लिए करोड़ों रुपए की विभिन्न स्तर पर आर्थिक सहायता भी दी जा चुकी है। इतनी सहायता गन्ना किसानों को सरकारी स्तर पर पहली बार मिली है। हाल ही में उप्र के कुछ किसानों ने मांग की है कि गन्ने का मूल्य 400 रुपए दिलाए जाए। उल्लेखनीय है कि शकर उद्योग 315 रुपए क्विंटल से भुगतान करने में असमर्थता व्यक्त कर चुके हैं, ऐसी स्थिति में 400 रुपए के भाव से भुगतान कैसे संभव है। फिर किसानों को यह सोचना भी जरूरी है कि उनसे खरीदे गए गन्ने से मिलें लाभ कमा रही हैं, या नहीं।

उत्पादन लागत घटाए

यह जग जाहिर है कि मिलें घाटे में हैं। ऐसी स्थिति में गन्ने के मूल्य बढ़ाकर मांगना कितना उचित है? यह बात सही है कि डीजल, उर्वरक और अन्य कृषि के कार्य में काम आने उपकरणों के भावों में वृद्धि हुई है, किंतु कई बार ऐसी वृद्धि को उत्पादकों को भी सहन करना पड़ती है। प्रत्येक बार लागत में वृद्धि के बाद भाव वृद्धि करने से किसी न किसी दिन गाड़ी पटरी से उतरने वाली ही है। उत्पादकों को उत्पादन लागत कम एवं लाभ का मार्जिन कम करने के प्रयास करना चाहिए। इसके अलावा जब देश में मांग से अधिक उत्पादन हो रहा हो, तो उस कृषि जिंस का उत्पादन कम करने के प्रयास करना चाहिए। अति उत्पादन का सर्वाधिक नुकसान उत्पादक को ही होता है।

38 अरब रुपए बकाया

केंद्र सरकार ने गन्ने का उचित एवं लाभकारी मूल्य 275 रुपए घोषित किया है। उप्र की शकर मिलें प्रति वर्ष घोषित से अधिक मूल्य ही देती हैं। यह भी सत्य है कि उप्र में गन्ने का उत्पादन अधिक हो रहा है, तो मिलों पर बकाया भी अधिक होगा। वर्ष 2017-18 के सीजन का अभी तक 78 अरब रुपया बकाया है। पिछले दिनों राज्य के मुख्यमंत्री ने इस बकाया राशि के भुगतान के लिए 40 अरब रुपए का बैंकों से ऋण दिलाने के प्रयास किए हैं। मिलों ने ऋण लेने के लिए 75 शकर मिलों ने आवेदन भी कर दिया है। उसके बाद भी 38 अरब रुपए का बकाया तो रह जाएगा। पिछले 2-3 माह से शकर का कोटा अधिक मात्रा में रिलीज किया जा रहा है, इससे किसानों को भुगतान करने में सहायता मिलेगी।

मिलें इस माह से शुरू होंगी

सीजन शुरू होने के पहले देश भर में यह हल्ला मचाया गया था कि नए सीजन में शकर का उत्पादन 350 से 355 लाख टन होगा। पिछला केरीओव्हर स्टॉक 100 लाख टन था इससे अधिक होने से कुल स्टॉक भारी-भरकम होगा। इससे उद्योग की नींव हिल जाएगी। हाल ही में सीजन शुरू हुआ है। पहले महीने में केवल 1.5 लाख टन शकर का उत्पादन हुआ है। नए सीजन के प्रारंभ में महाराष्ट्र की मिलों ने उत्पादन शुरू किया है। उप्र की मिलें इस माह शुरू हो रही हंै। कृषि विभाग के अधिकारी अधिक मात्रा में उत्पादन की बात कर रहे हैं, जबकि शकर संगठन के अधिकारी 315 लाख टन की बात ही करने लगे हैं, अर्थात् गत वर्ष से भी कम। पिछले वर्ष शकर उद्योग के संगठन ने पहले 270 लाख टन उत्पादन का अनुमान लगाया था और कुल उत्पादन 322 लाख टन हो गया। शकर उद्योग संगठन की जितनी भी आलोचना की जाए, वह कम है। इस उद्योग संगठन के पदाधिकारी या तो सच नहीं बोलते हैं, अथवा बाजार को प्रभावित करने के लिहाज से अनुमान व्यक्त करते हैं।

182 तालुका में सूखा

जानकारों का मानना है कि वर्षा की कमी से महाराष्ट्र एवं उप्र में गन्ना फसल को नुकसान की खबरें आ रही हैं। महाराष्ट्र के 182 तालुका क्षेत्रों में पानी की कमी है। इनमें गन्ना उत्पादन भी होता है। उप्र एवं कर्नाटक के कुछ भाग सूखे की चपेट में है। इस वजह से गन्ने का उत्पादन कम होगा। कुल उत्पादन में कितनी कमी आएगी, यह अनुमान लगाना कठिन है। गन्ने की फसल को पानी की आवश्यकता हमेशा बनी रहती है। चालू सीजन के पहले माह में करीब 47 मिलों ने उत्पादन शुरू कर दिया था। उसमें महाराष्ट्र 15, गुजरात 10 तमिलाडु 10, और कर्नाटक की 12 मिलें है। मानसून ने अंतिम चरण में कई राज्यों को धोखा दिया है। इस वजह से उत्पादन अनुमान बदलना ही है। उप्र में 130 से 135 लाख टन की बजाय 120 महाराष्ट्र में 95 लाख टन का अनुमान व्यक्त किया जा रहा है। पिछले वर्ष 107 लाख टन का उत्पादन हुआ था।

एथनॉल का उपयोग बढ़े

एथनॉल का उपयोग बढ़ाया जाता है, तो शकर उद्योग का लाभ होगा। वर्ष 2018-19 में तेल कंपनियों ने 287 करोड़ लीटर के अनुबंध कर लिए हैं। तेल कंपनियों को 10 प्रतिशत ब्लेडिंग के लिए 330 करोड़ लीटर एथनॉल की जरूरत है। शकर मिलों ने दो टेंडरों में 287 करोड़ लीटर की स्वीकृति दे दी है। उल्लेखनीय है कि पिछले सीजन में सिर्फ 160 करोड़ लीटर के सौदे हुए थे और 145 से 150 करोड़ की आपूर्ति हो चुकी है। शेष आपूर्ति 30 नवंबर तक होने की संभावना व्यक्त की जा रही है।

8.32 लाख टन का निर्यात

उल्लेखनीय है कि शकर उत्पादन में करीब 35 से 40 लाख टन की कमी आने के बाद भी भावों पर एवं स्टॉक पर विशेष फर्क अभी तक तो पड़ता नजर नहीं आ रहा है। चालू सीजन में अभी तक 8.32 लाख टन शकर के निर्यात सौदे हुए। कुल 50 लाख टन निर्यात का लक्ष्य रखा गया है। विश्व में कच्ची शकर की मांग है। और भाव भी निर्यात करने लायक है। यदि 40 लाख टन शकर निर्यात करने में उद्योग सफल हो जाता है, तो कुल केरीओव्हर स्टॉक में कमी आ सकेगी। इस वर्ष 315 लाख टन उत्पादन में 40 लाख टन कम हो जाती है, तो 275 लाख टन शेष रहेगी। पूरे वर्ष में 250 से 255 लाख टन की खपत होती है। अत: 20 से 25 लाख टन का केरीओव्हर स्टॉक नए सीजन का रह जाएगा। पिछले वर्ष का करीब 100 लाख टन शेष तो बचा रहने वाला ही है। इसे घरेलू खपत बढ़ाकर कम किया जा सकता है।

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