बच्चे लेंगे गेड़ी का मजा, किसान करेंगे हल बैल की पूजा

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सावन माह की अमावस्या होने से हरियाली का प्रतीक लोक पर्व हरेली शनिवार को धूमधाम से मनाया जाएगा। छत्तीसगढ़ में इसे माई तिहार अर्थात्‌ साल का पहला त्योहार माना जाता है। बारिश जारी रहने से खेतों में जुताई से लेकर रोपाई बियासी के तौर पर प्रथम चरण की खेती पूरा होने व खेतों में हरियाली बिखरने की खुशी में यह त्योहार मनाया जाता है। पर्व में किसान हल बैल सहित कृषि संबंधित औजारों की पूजा करेंगे। बच्चे बांस से बनी गेड़ी में चढ़ने का आनंद लेते हैं।

पर्व के पीछे जन श्रुति यह है कि जब वरूण देव वर्षा से पूरी धरती को सराबोर कर देते हैं, तब हरितिमा धरती के चारो ओर छा जाती है। इस उल्लास में किसान हरियाली पर्व मनाते हैं। परंपरा के अनुसार किसान इस दिन खेतों में जुताई व अन्य कृषि कार्य बंद रखते हैं। बैल को नहला कर व कृषि औजार को सरोवर अथवा नदी में धोकर घर लाया जाता है। तत्पश्चात चावल का लेप बनाकर कृषि औजारों में थाप दी जाती है। गोशाला में बैलों व गौ माता की पूजा की जाती है। घर, गोशाला व खेतों में नीम अथवा भेलवा के डाल को उचित जगह लगाया जाता है। इसके पीछे मान्यता यह है कि बीमारी के जीवाणु से निजात मिलेगी। पारंपरिक पकवानों से घर सुवासित हो उठता है। खासतौर पर इस त्योहार में नमकीन व मीठा चीला बनाया जाता है।

चावल के मांढ़ से बनने वाले इस पकवान को प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है। पर्व में बांस से बनी गेड़ी बनाकर चढ़ने की भी परंपरा है। ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चों में गेड़ी चढ़ने को लेकर उत्साह देखा जा रहा है। बांस की लकड़ी में कमची लगा कर बनाई जाने वाली गेड़ी के प्रति युवाओं का भी उत्साह रहता है। कई गांवों में गेड़ी दौड़ का भी आयोजन किया जाता है। इसके अलावा नारियल फेंकने की प्रतियोगिता भी आयोजित की जाती है। कई गांव में पहले बैल दौड़ का भी आयोजन किया जाता था। बदलते परिवेश के दौर में यह परंपरा अब बंद हो गई है। पर्व में महिलाएं देव घर की सफाई कर पूजा पाठ करती हैं। मान्यता यह भी है कि बैगा गुनिया का काम करने वाले लोग इस दिन शिष्यों को दीक्षा देते हैं। आगामी फसल के उपज में बेहतर उत्पादन की कामना के साथ इस पर्व को धूमधाम से मनाया जाता है। ग्रामीण क्षेत्र के अलावा शहरी क्षेत्र में विभिन्न सामाजिक संगठनों की ओर से पर्व का आयोजन किया गया है।

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